अभी हाल ही मे, 9 सितम्बर को बाबा नीम करौली की जीवनी और दर्शन पर आधारित फिल्म “हनुमान अंश” देखने का मौका मिला, जिसने मेरे भीतर एक गहरी आध्यात्मिक हलचल पैदा कर दी। उसके दो दिन बाद यानि 11 सितंबर को अचानक मेरे मन में यह विचार आया कि क्यों न बाबा नीम करौली के अलौकिक जीवन और उनके रहस्यों पर कुछ लिखा जाए। और संयोग देखिये या यूँ कहें कि परमपिता की कृपा देखिए कि ठीक उसी दिन मुझे बाबा नीम करौली पर आधारित एक बेहद दुर्लभ और पावन पुस्तक भी पढ़ने को मिली। जब मैंने उस पुस्तक के पन्नों को पलटना शुरू किया, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए—मैंने पाया कि जिस 11 सितंबर को यह विचार मेरे मन में आया, ठीक उसी तिथि (11 सितंबर 1973) को बाबा ने अपना भौतिक शरीर छोड़ा था। इसे मात्र एक सामान्य संयोग कहना भूल होगी; यह निश्चित ही उन महायोगी की कोई मूक प्रेरणा या उनकी अपनी मर्जी थी, जो वे मुझे इस पवित्र विषय पर कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
आइए, इस संकलन और पुस्तक के कुछ चुनिंदा प्रसंगों के माध्यम से इस रहस्य को समझें कि आखिर यह ‘हनुमान अंश’ और बाबा नीम करौली का जीवन अध्यात्म के किस उच्च शिखर को छूता है।
जब मैं इस पुस्तक को पढ़ रहा था तो वैसे तो इसमे बहुत सारे अद्भुत प्रसंग बाबा के दिये हुए है लेकिन एक दो प्रसंग को यहाँ साझा करना जरूरी समझता हूँ। आज के समय में मैं ऐसे काफी लोगो से मिलता हूँ जो कहते है कि मैं इतने समय से ये साधना कर रहा हूँ लेकिन कोई फल नहीं मिल रहा है। इसको समझने के लिए इस किताब में बाबा का एक बहुत अच्छा प्रसंग है। जो इन सभी शंकाओं का बहुत ही सहज और दिव्य समाधान प्रस्तुत करता है।
जब हम अध्यात्म के पथ पर आगे बढ़ते हैं, तो अक्सर हमारे मन में यह दुविधा उत्पन्न होने लगती है कि हम जो साधना, जप या अनुष्ठान कर रहे हैं, उसका फल हमें प्रत्यक्ष रूप से क्यों नहीं मिल रहा? क्या हमारी साधना सही दिशा में है या हमें किसी अन्य बड़े मार्ग की आवश्यकता है?
वह प्रसंग: जब अंतर्यामी बाबा ने मन की थाह ली
बात उन दिनों की है जब बाबा नीम करौली के सान्निध्य में एक आध्यात्मिक सभा चल रही थी। वहाँ उपस्थित एक पंडित जी, जिनका नाम जगदेव प्रसाद तिवारी था, बड़ी श्रद्धा से बाबा की बातें सुन रहे थे। उनके मन में लंबे समय से आध्यात्मिक साधना के लिए उचित मार्गदर्शन पाने की एक गहरी कसक और जिज्ञासा थी, किंतु वे संकोचवश बाबा से कुछ कह नहीं पा रहे थे।
लेकिन अंतर्यामी बाबा तो सबके मन के भावों को बिना कहे ही जान लेते थे। उन्होंने भीड़ के बीच से ही पंडित जगदेव प्रसाद तिवारी को आगे बुलाया और उनका नाम लेकर संबोधित किया।
बाबा ने प्रेम से पूछा, “तुम गायत्री जप करते हो न? ‘अखंड-ज्योति’ पत्रिका भी तो पढ़ते हो?”
पंडित जी ने विस्मय और आश्चर्य से भरे स्वर में सहर्ष “हाँ” कहा।
तब बाबा नीम करौली ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वह आज के हर साधक के लिए एक महान संदेश है। बाबा ने कहा—
“तुम गायत्री मंत्र का जप करते हो, ‘अखंड-ज्योति’ भी पढ़ते हो, फिर कमी क्या है? कमी यह है कि तुम जो करते हो, उसके महत्त्व से परिचित नहीं हो। जो करते हो उसके महत्त्व को भी समझो। गायत्री ब्रह्मविद्या का मंत्र है। जो इसे श्रद्धा व मनोयोगपूर्वक करता है, उसे किसी अन्य साधना की जरूरत नहीं है। गायत्री-साधना यदि निरंतर होती रहे, तो आगे के रास्ते स्वयं खुलते हैं। अंतर्यात्रा का पथ स्वयं प्रकाशित होता है। इसलिए जो कर रहे हो, उसे करते चले जाओ—अविराम, निर्बाध, श्रद्धा-भाव से, दीर्घ काल तक, फिर तुम देखोगे कि सब कुछ स्वयं प्रकट हो जाएगा/”
इस प्रसंग से मिलने वाला गहरा आध्यात्मिक संदेश
- अपनी साधना पर पूर्ण अटूट विश्वास:
इस प्रसंग के माध्यम से बाबा नीम करौली का समस्त साधकों को यही संदेश है कि मनुष्य अक्सर घास हरी देखने के फेर में अपनी ही बोई हुई फसल उखाड़ देता है। हम जो भी इष्ट-मंत्र, गायत्री साधना, या अन्य कोई जप या ध्यान कर रहे हैं, वह अपने आप में सर्वोच्च है। आवश्यकता इस बात की है कि हम भटके नहीं, बल्कि अपनी चुनी हुई साधना के प्रति पूरी निष्ठा और निरंतरता बनाए रखें।
- प्रत्यक्ष परिणाम की लालसा से मुक्ति:
साधना का मार्ग बीज बोने जैसा है। बीज जमीन के भीतर चुपचाप अपनी प्रक्रिया पूरी करता है, वह रातों-रात पेड़ बनकर फल नहीं देता। इसी प्रकार, आपकी साधना का प्रभाव भले ही आपको तुरंत या प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे रहा हो, लेकिन वह भीतर ही भीतर आपकी चेतना को परिष्कृत कर रहा होता है। जब समय पकता है, तो वही साधना आपके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ले आती है।
- नियमितता और निरंतरता ही कुंजी है:
बाबा ने स्पष्ट किया कि गायत्री जैसी ब्रह्मविद्या और निरंतर जप मनुष्य के अंतःकरण के द्वार स्वतः खोल देते हैं। आपको इधर-उधर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है, बस आपकी श्रद्धा में खंडित भाव नहीं आना चाहिए।
यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जीवन में उथल-पुथल कितनी भी हो, अपने आराध्य और अपनी साधना की डोर को कभी कमजोर मत पड़ने दीजिए। जो आप पूरी पवित्रता और भाव से कर रहे हैं, वही आपके उद्धार का मार्ग है।
इसी कड़ी में इस किताब में एक प्रसंग और है जिसको बताना चाहूँगा जोकि पंडित शंकर प्रसाद व्यास (बनारस) से जुड़ा हुआ है, उसकी कथा इस प्रकार है:
कैंची आश्रम में निवास करते हुए एक दिन पं. शंकर प्रसाद जी व्यास को शाम के समय बाबा के साथ टहलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आश्रम के सामने की सड़क पर बाबा व्यास जी के कंधे पर हाथ रखकर चल रहे थे। वे अपने विचारों में मग्न दिखाई दिए, इस कारण व्यास जी भी मौन रहे।
एकाएक व्यास जी के मन में एक विचार आया कि लोग बाबा को हनुमान का अवतार बताते हैं, पर इस बात पर विश्वास कैसे किया जाए? ऐसा सोचते ही उनके कंधे पर रखा हुआ बाबा का हाथ उन्हें कुछ भारी प्रतीत होने लगा और धीरे-धीरे उसका भार बढ़ता ही चला गया, यहाँ तक कि उनका कंधा जवाब देने लगा। हाथ सहज रूप से उनके कंधे पर पड़ा था और उसका आकार यथावत था। व्यास जी भीतर ही भीतर बहुत परेशान हो गए। प्रेम से रखे गए इस महान विभूति के हाथ को हटाने में भी उन्हें संकोच हो रहा था।
अपनी ऐसी विवशता में वे मन ही मन बाबा (हनुमान जी) से प्रार्थना करने लगे कि मुझे मेरी धृष्टता के लिए क्षमा करें। ऐसा कहते ही स्थिति पूर्ववत हो गई। इस प्रकार उनकी धारणा पक्की हो गई कि बाबा निश्चय ही हनुमान के अवतार हैं।
पंडित शंकर प्रसाद व्यास जी वाला यह प्रसंग इस बात का सबसे जीवंत प्रमाण है कि एक सच्चे शिष्य और सद्गुरु के बीच का रिश्ता तर्क, अविश्वास या भौतिक सीमाओं से बहुत ऊपर होता है।
जब व्यास जी के मन में यह सूक्ष्म शंका उठी कि “लोग बाबा को हनुमान का अवतार कहते हैं, पर इस बात पर विश्वास कैसे किया जाए?”—तो उनकी इस आंतरिक अविश्वास की भावना को बाबा ने शब्दों से नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा के भारीपन से महसूस करा दिया। उनके कंधे पर रखा हुआ बाबा का हाथ अचानक इतना भारी हो गया कि उनका कंधा जवाब देने लगा। यह इस बात का प्रतीक था कि जब साधक के मन में गुरु की दिव्यता पर संदेह या अविश्वास का बादल मंडराता है, तो उसका आध्यात्मिक बोझ और मानसिक तनाव बढ़ जाता है।
लेकिन जैसे ही व्यास जी को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने मन ही मन अपनी धृष्टता के लिए क्षमा मांगी, वैसे ही सब कुछ पूर्ववत हो गया। यह प्रसंग हमें यही सिखाता है कि:
- अविश्वास ही सबसे बड़ा अवरोध है: आध्यात्मिक मार्ग पर जब तक मन में संदेह या तर्क-कुतर्क का पर्दा रहता है, तब तक गुरु की वास्तविक कृपा का अनुभव नहीं हो पाता।
- समर्पण ही समाधान है: गुरु पर अटूट विश्वास और पूर्ण शरणागति ही वह मार्ग है जो हर प्रकार के मानसिक बोझ और भ्रम को पलभर में हल्का कर देती है।
बाबा नीम करौली का यह प्रसंग हर साधक को यह चेतावनी और सीख देता है कि गुरु की महानता को अपने छोटे तर्कों से तौलने की भूल कभी न करें, क्योंकि वे जो हैं, वह हमारी सीमित बुद्धि से परे की बात है।
सूक्ष्म शरीर की यात्रा और उसकी सीमाएं (बाबा रामदास का प्रसंग)
पुस्तक में रिचर्ड एल्पर्ट (जो बाद में बाबा रामदास बने) के सूक्ष्म-भ्रमण (Astral Travel) का एक बहुत ही रोचक और गहरा प्रसंग है:
- जब रामदास ने अपनी साधना के बल पर सूक्ष्म शरीर से अन्य लोकों की यात्रा करनी शुरू की और उनके भीतर एक प्रकार की सिद्ध-शक्ति का अहंकार या मोह जागने लगा, तब बाबा नीम करौली ने एक ही फूँक से उनकी उस साधना और शक्ति को समूल समाप्त कर दिया।
- बाबा ने उन्हें समझाया कि कच्ची साधना में सूक्ष्म शरीर से इधर-उधर भटकना खतरनाक हो सकता है और यह साधक को अहंकार के दलदल में फंसा सकता है।
यहाँ ध्यान का एक सबसे बड़ा रहस्य यह समझ में आता है कि ध्यान का उद्देश्य केवल चमत्कारी सिद्धियां या सूक्ष्म लोकों की सैर करना नहीं है, बल्कि अपनी चेतना को अहंकार-मुक्त करना और परम सत्य से जुड़ना है। सच्चा गुरु साधक को हर उस भटकाव से बचाता है जो उसकी आध्यात्मिक प्रगति को खंडित कर सकता है।
पुस्तक के वे प्रसंग जो झकझोर देते हैं: आस्था और चमत्कार से परे यथार्थ
बाबा नीम करौली का जीवन किसी खुली किताब जैसा था, जिसे कोई भी पढ़ सकता था पर जिसकी गहराई को पाना हर एक के बस की बात नहीं थी। इस पुस्तक में कई ऐसे प्रसंग दर्ज हैं जो हमें अछ्वुत अध्यात्म का बोध कराते हैं:
- लंदन की बस में कंबलमय दर्शन: पुस्तक में अमेरिकी महिला हीथर थौम्पसन ( जिन्हें बाबा ने ‘सीता’ नाम दिया था) का एक अत्यंत रोचक संस्मरण है। मई 1972 की बात है, वे लंदन की एक खाली बस में सफर कर रही थीं। तभी बस में एक वृद्ध भिखारी चढ़ा, जिसने फटे कपड़ों के ऊपर एक लाल-नीला कंबल ले रखा था। वह उनकी बगल में आकर बैठा और उसकी मुस्कान बेहद सम्मोहक थी। कुछ ही पलों बाद जब हीथर का ध्यान बाबा नीम करौली की तरफ गया और उन्होंने मुड़कर देखा, तो वह वृद्ध वहाँ से गायब था, जबकि बस कहीं रुकी भी नहीं थी और सड़क पूरी तरह सुनसान थी। बाद में चमत्कारी रूप से उनके भारत आने के सारे साधन जुट गए और जब वे कैंची धाम पहुँचीं, तो उन्होंने बाबा को वही कंबल और वही मुस्कान के साथ पाया। यह घटना सिद्ध करती है कि महापुरुष देश और काल की सीमाओं से परे कहीं भी प्रकट हो सकते हैं।
- डॉक्टर सक्सेना और होम्योपैथिक की मीठी गोलियां: इलाहाबाद के एक होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. ब्रह्मस्वरूप सक्सेना के पास एक दिन एक ऐसा असाध्य रोगी आया जिसकी आँखें चेहरे से बाहर निकल आई थीं। जब डॉक्टर साहब ने हाथ खड़े कर दिए, तो रोगी ने कहा कि उसे बाबा नीम करौली ने भेजा है और आपकी दवा से वह ठीक हो जाएगा। डॉक्टर साहब ने असमंजस में ‘अर्निका’ की गोलियां दे दीं, और रोगी ठीक हो गया। बाद में जब स्वयं बाबा उनके पास आए और बिना अपनी असली पहचान बताए दवा ली, तब डॉक्टर साहब को पता चला कि साक्षात् ईश्वर उनके द्वार पर आए थे। इससे उनका पूरा जीवन ही बदल गया।
अध्यात्म की असली परिभाषा:
इन सभी प्रसंगों और बाबा की शिक्षाओं से यही निष्कर्ष निकलता है कि असली आध्यात्मिकता बाहरी दिखावे, जटा-दाड़ी या आडंबर में नहीं है, बल्कि मन की पवित्रता और निःस्वार्थ सेवा में है। हमारे भीतर का मन ही वह चंचल वानर है, जो एक डाल से दूसरी डाल भटकता रहता है। जब तक इसे राम-नाम रूपी भक्ति की डोर से नहीं बांधा जाता, तब तक आंतरिक शांति असंभव है। बाबा ने कभी अपने चमत्कारों का प्रचार नहीं किया, वे हमेशा एक साधारण कंबल ओढ़कर रहे और अहंकार को सबसे बड़ा बाधक बताया। उनका स्पष्ट संदेश था कि हर मनुष्य में उसी परम ऊर्जा या ‘हनुमान अंश’ का वास है, बस जरूरत है तो अपने अंतःकरण को निर्मल करने की।










5 comments on ““बाबा नीम करौली: चमत्कारों से परे छिपा ‘हनुमान अंश’ का रहस्य””
ॐ नमः शिवाय : । महादेव । महादेव । अपनी चेतना को अहंकार-मुक्त करना और परम सत्य से जुड़ना ….
Very Nice Information…Beautifully explained in Hanuman Ansh-when faith and trust in God are real, miracles happen.🙏✨🚩
इस कथा को पढ़कर मेरा मन हल्का हुआ। कहा भी जाता है जो हनुमान जी से किसी भी रूप में जुड़ता है उसका मन आध्यात्म की ओर झुकता है। और उसे भगवान की शक्ति का अहसास होता है।
जय बाबा नीम करौली 🙏💖
अति उत्तम कथा इस कथा को पढ़कर मेरा मन हल्का हुआ। कहा भी जाता है जो हनुमान जी से किसी भी रूप में जुड़ता है उसका मन आध्यात्म की ओर झुकता है। और उसे भगवान की शक्ति का अहसास होता है।
जय बाबा नीम करौली 🙏💖
अति उत्तम
सुनील कुमार अग्रवाल