अभी हाल ही मे, मैं एक गुरुजी का प्रवचन सुन रहा था। उसमें उन्होंने एक वृतांत सुनाया जो मेरे मन को बहुत अच्छा लगा क्योंकि उसमें उन्होंने भी यही बताया कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और अगर वो चाहे तो किसी भी इंसान की नियति को भी परिवर्तित कर सकता है बशर्ते जरूरत है तो विश्वास और समर्पण की। यही बात मैंने भी अपने पिछले कई लेखो में लिखी है कि अपने इष्ट के प्रति समर्पण में इतनी शक्ति होती है कि कुंडली के बुरे प्रभावों को भी टाला जा सकता है। हालांकि मैं भी ज्योतिष का विद्यार्थी हूँ और कुंडली की गणनाओं के आधार पर व्यक्ति के बुरे कर्म जनित दोषों की पहचान करके उसके संबन्धित उपाय भी बताता हूँ। जोकि आप मेरी दूसरी वेब साइट www.jyotishworld.com पर परामर्श ले सकते है। लेकिन आजकल उपाय देना भी एक फ़ैशन सा बन गया है और लेने वाले लोगो में भी उस उपाय के प्रति श्रद्धा कम और instant रिजल्ट ज्यादा चाहिए। मतलब उनको लगता है कि कुछ उपाय कर लेने से उसके सभी पाप धुल जाएंगे। इसीलिए वो लोग ज्योतिषियों के चक्कर काटते रहते है। मिलता कुछ नहीं क्योंकि वो उपाय केवल औपचारिकता निभाने के लिए करते है नाकि समर्पण भाव से।
चलिये अब बात करते है उस रोचक वृतांत की: जब मृत्यु देने वाले ग्रह भी बेबस हो गए
कथा के अनुसार, एक बड़े ज्योतिष के मर्मज्ञ और सिद्ध महात्मा जी ने एक व्यक्ति की कुंडली देखकर यह बताया कि उसकी आयु समाप्त हो चुकी है और उसका बचना असंभव है। कोई भी ग्रह उसके पक्ष में नहीं था, सभी उसकी मृत्यु के कारक बन रहे थे।
जब उस व्यक्ति को यह बात पता चली, तो वह जरा भी घबराया नहीं। उसके मन में भगवान के प्रति पहले से ही अगाध प्रेम और अटूट विश्वास था। उसने सोचा, “जब जीवन का अंत तय ही है, तो क्यों न बचा हुआ पूरा समय भी अपने भगवान के भजन और स्मरण में बिताया जाए?” वह संसार की चिंताओं को छोड़कर पूरी तरह भगवान की भक्ति में लीन हो गया। उसने अपना हर पल अपने इष्ट के नाम जप में लगा दिया।
कुछ समय बाद, वही ज्योतिषी उस व्यक्ति से मिले। उसे जीवित और पूरी तरह स्वस्थ देखकर वे हैरान रह गए। उन्होंने अचंभित होकर पूछा, “तुम्हारी कुंडली के अनुसार तो तुम्हारा इस संसार में रहना ही संभव नहीं था, फिर तुम जीवित कैसे हो और तुम्हारे सिर में दर्द तक क्यों नहीं हुआ?”
उस भक्त ने प्रेम से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “महाराज, जब आपने मुझे बताया था कि मेरे दिन पूरे हो चुके हैं, तो मैंने डरने के बजाय अपना पूरा ध्यान भगवान की भक्ति में लगा दिया। अब मैं केवल अपने इष्ट को जानता हूँ।”
यह देखकर उन महान संत और सिद्ध ज्योतिषी योगी ने समाधि लगाई और सीधे नवग्रहों से संपर्क स्थापित किया कि उन्होंने उस जातक के भाग्य में मृत्यु और कष्ट होने के बावजूद उसे जीवन क्यों दान दे दिया और ज्योतिष को कैसे निष्फल कर दिया?
नवग्रहों का उत्तर: भक्त के आगे क्यों हार गए सारे ग्रह?
जब संत ने एक-एक ग्रह से इसका कारण पूछा, तो ग्रहों के उत्तर बड़े ही रोचक और गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करने वाले थे।
- सूर्य देव: सूर्य देव से पूछा गया कि तुमने इसका अनिष्ट क्यों नहीं किया? सूर्य देव ने हाथ जोड़कर कहा, “यह जातक श्री कृष्ण का अनन्य भक्त है, और श्री कृष्ण मेरी पुत्री यमुना जी के पति (मेरे दामाद) हैं। जो मेरे दामाद का भक्त हो, उसका बुरा मैं कैसे कर सकता हूँ?”
- चंद्र देव: चंद्र देव से पूछा गया कि वह नीच स्थिति में होने के बावजूद शांत क्यों रहे? उन्होंने उत्तर दिया, “भगवान श्रीकृष्ण चंद्रवंश में प्रकट हुए हैं, और यह जातक उन्हीं का भक्त है। यह तो एक प्रकार से हमारे ही खानदान का है, इसका बुरा हम कैसे कर सकते हैं?”
- मंगल देव : मंगल देव ने कहा, “रामावतार में हम भगवान राम के साले हैं (क्योंकि हम भूमि पुत्र हैं) और कृष्णावतार में भू-देवी (सत्यभामा) के पुत्र हैं। इस प्रकार राम भक्त हो या कृष्ण भक्त, वह हमारा भांजा ही तो लगता है। मामा अपने भांजे का बुरा क्यों करेगा?”
- बुध देव और बृहस्पति देव : बुध देव ने कहा कि वे सौम्य ग्रह हैं और भगवान के भक्तों का कभी बुरा नहीं करते। देवगुरु बृहस्पति जी ने भी कहा, “जो कोई भी भगवान के भजन में लग जाता है, उससे हम अत्यंत प्रसन्न होते हैं। हमने उसके भजन की सारी बाधाएं समाप्त कर दीं और उसे और अधिक भक्ति में लगा दिया।”
- शुक्र देव : दैत्यगुरु शुक्राचार्य जी ने अपने प्रसंग का स्मरण किया कि कैसे बलि महाराज के यज्ञ के दौरान भगवान वामन को जल देते समय उन्होंने बाधा डाली थी, तब भगवान ने उनकी एक आंख फोड़ दी थी। शुक्र देव बोले, “हमें अब किसी भी भक्त से उलझकर अपनी दूसरी आंख नहीं गवानी है, एक आंख से काम चल रहा है।”
- शनि देव: शनि देव के बारे में कहा गया कि वे उच्च कोटि के भगवद् भक्त और योगी ग्रह हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि देव को अनन्य कृष्ण भक्त बताया गया है। शनि देव संसार के भौतिक सुख भले ही छीन लेते हैं, परंतु वे केवल भगवत-विमुख (भगवान से दूर रहने वाले) लोगों को दंडित करते हैं, भक्तों का कभी अनिष्ट नहीं करते।
- राहु और केतु देव : राहु महाराज ने उत्तर दिया, “समुद्र मंथन के दौरान जब हमने गलती की थी, तो हमारे सिर और धड़ (केतु) के दो टुकड़े हो गए थे। यदि अब हम किसी भगवद् भक्त का बुरा करेंगे, तो न जाने हमारे और कितने टुकड़े हो जाएंगे, इसलिए हम ऐसा दुस्साहस भूलकर भी नहीं कर सकते।”
संतुलन का मार्ग: संसार में रहते हुए ईश्वर से जुड़ना
यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि इस कथा का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने सारे सांसारिक काम-धंधे, परिवार की जिम्मेदारियाँ और कामकाज छोड़कर एक कोने में बैठ जाएं।
भारतीय संस्कृति और हमारे ग्रंथ कभी भी कर्म से भागने की शिक्षा नहीं देते। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी से करना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि:
- संसार में रहकर काम करें: आप अपनी नौकरी करें, व्यापार संभालें, परिवार की देखरेख करें और अपनी सभी सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाएं।
- भीतर से इष्ट के प्रति समर्पण रखें: बाहरी रूप से आप दुनिया के सारे काम करें, लेकिन अपने मन और अपने भीतर के भाव को अपने इष्ट से जोड़कर रखें। यह विश्वास रखें कि जो कुछ भी हो रहा है, वह मेरे भगवान की इच्छा से हो रहा है।
जब इंसान अपने हर छोटे-बड़े काम को करते हुए अपने इष्ट को याद रखता है, तो उसका अहंकार गल जाता है। वह यह मान लेता है कि वह केवल एक निमित्त मात्र है, असली चलाने वाले तो उसके भगवान हैं।
इस कथा की गहरी सीख: भगवान ही सब कुछ हैं
इस पूरी कथा से हमें यह बहुत बड़ा जीवन-संदेश मिलता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं और उनकी कृपा किसी भी ज्योतिषीय गणना या ग्रहों के प्रभाव से बहुत ऊपर है।
जब मनुष्य अपने कर्तव्यों को निभाते हुए अपने इष्ट के प्रति सच्चा समर्पण रखता है, तो जीवन के बड़े से बड़े संकट भी उसे तोड़ नहीं पाते। वे संकट परीक्षा बनकर आते हैं और और अधिक मजबूत बनाकर चले जाते हैं।
अतः यदि आपके जीवन में भी कभी ऐसा समय आए जब चारों तरफ से परेशानियां घेर लें, तब किसी बाहरी भय से डरने के बजाय अपने भीतर के विश्वास को मजबूत करें। अपने काम पूरी ईमानदारी से करें, लेकिन अपने दिल का भार अपने इष्ट पर छोड़ दें। जब मालिक का हाथ सिर पर हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपका बाल भी बांका नहीं कर सकती।











2 comments on “कुंडली में मृत्यु का योग, फिर भी नवग्रह क्यों रह गए बेबस? एक भक्त की अद्भुत कथा”
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Bahut gyanvardhk jankari mili aapki is katha se , accha laga padker