जब ज्ञान केवल पढ़ा नहीं, बल्कि जीवन में उतारा जाए, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है।

 

इसी भावना के साथ “धर्मसिंधु” WhatsApp Channel or facebook page का शुभारंभ किया गया है, जहाँ वैदिक ज्योतिष, सनातन धर्म, आध्यात्मिक रहस्य और ऋषियों की ज्ञान परंपरा से जुड़ी दुर्लभ जानकारियाँ नियमित रूप से साझा की जाएँगी।

 

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लेखक का परिचय

इस “धर्म सिंधु” साइट का मुख्य उद्देश्य सभी लोगों को अपने हिन्दू सनातन धर्म के अनोखे ज्ञान की गहराई से कुछ अंश उपलब्ध कराना है, क्योंकि हमारी सनातन संस्कृति पूरे ब्रह्मांड के व्यावहारिक ज्ञान का आधार हैं। यह संस्कृति जीवन के अलग-अलग आयामों के बारे में जानकारी देती हैं। यहाँ असंख्य ऋषि मुनियों ने तप करके जो ज्ञान अर्जित किया उसकी हर एक बून्द हमारे समाज के लिए एक बहुमूल्य उपहार है। हालाँकि मैं इतनी महान संस्कृति की व्याख्या करने के योग्य नहीं हूँ, फिर भी मेरी इष्ट देवी “माँ ललिता महात्रिपुरसुन्दरी” की कृपा से मैं इसमें जो कुछ भी लिख पाऊँगा, उसे मैं अपने ऊपर उनका आशीर्वाद ही मानूंगा।

मेरे परिचय में कहने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है। मेरा नाम शशि कान्त सिंघल है और मैं पिछले 25 वर्षों से कॉर्पोरेट जगत में एक उच्च वित्त प्रबंधक की यात्रा कर रहा हूँ लेकिन हृदय में आध्यत्मिकता और ज्योतिष रची बसी है। इसीलिए पिछले 6 वर्षो से इस पर कार्य कर रहा हूँ। ज्योतिष के क्षेत्र में मैंने वर्ष 2024 में IGNOU, नई दिल्ली से M.A. (JYOTISH) पूर्ण किया। इसके अतिरिक्त वर्ष 2021 में वाराणसी स्थित भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थान से “ज्योतिष विद्या विशारद” तथा 2020 में AIFAS, दिल्ली से “ज्योतिष रत्न” की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2021 में मैं अपने ज्योतिष गुरु श्री दीपांशु गिरि जी के संपर्क में आया और मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी। उनके  मार्गदर्शन में निरंतर उन्नत ज्योतिष पाठ्यक्रमों का अध्ययन कर रहा हूँ। हालांकि उनके अलावा भी, मुझे अपनी ज्योतिष सिखने की यात्रा में अनेक गुरुओं का मार्गदर्शन मिला जिनमे श्री अभिजीत कृष्णन जी, श्री संजय रथ जी मुख्य है। अभी वर्तमान में, मैं एक आध्यात्मिक और ज्योतिष गुरु श्री दत्तात्रेय तापकीर जी के निर्देशन में ज्योतिष में PHD कर रहा हूँ।

बस इतना कह सकता हूँ कि जो भी ज्ञान मेरे पास है, वह मेरे सभी गुरुओं का आशीर्वाद है। मेरे गुरुओं ने मुझे ज्योतिष के साथ-साथ कई गुप्त रहस्यों के बारे में भी जानकारी दी। इस साइट के ज़रिए गुप्त ज्ञान की इस गंगा को आगे बढ़ाना ही मेरा लक्ष्य है।

लेखक का परिचय

इस “धर्म सिंधु” साइट का मुख्य उद्देश्य सभी लोगों को अपने हिन्दू सनातन धर्म के अनोखे ज्ञान की गहराई से कुछ अंश उपलब्ध कराना है, क्योंकि हमारी सनातन संस्कृति पूरे ब्रह्मांड के व्यावहारिक ज्ञान का आधार हैं। यह संस्कृति जीवन के अलग-अलग आयामों के बारे में जानकारी देती हैं। यहाँ असंख्य ऋषि मुनियों ने तप करके जो ज्ञान अर्जित किया उसकी हर एक बून्द हमारे समाज के लिए एक बहुमूल्य उपहार है। हालाँकि मैं इतनी महान संस्कृति की व्याख्या करने के योग्य नहीं हूँ, फिर भी मेरी इष्ट देवी “माँ ललिता महात्रिपुरसुन्दरी” की कृपा से मैं इसमें जो कुछ भी लिख पाऊँगा, उसे मैं अपने ऊपर उनका आशीर्वाद ही मानूंगा।

मेरे परिचय में कहने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है। मेरा नाम शशि कान्त सिंघल है और मैं पिछले 25 वर्षों से कॉर्पोरेट जगत में एक उच्च वित्त प्रबंधक की यात्रा कर रहा हूँ लेकिन हृदय में आध्यत्मिकता और ज्योतिष रची बसी है। इसीलिए पिछले 6 वर्षो से इस पर कार्य कर रहा हूँ। ज्योतिष के क्षेत्र में मैंने वर्ष 2024 में IGNOU, नई दिल्ली से M.A. (JYOTISH) पूर्ण किया। इसके अतिरिक्त वर्ष 2021 में वाराणसी स्थित भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थान से “ज्योतिष विद्या विशारद” तथा 2020 में AIFAS, दिल्ली से “ज्योतिष रत्न” की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2021 में मैं अपने ज्योतिष गुरु श्री दीपांशु गिरि जी के संपर्क में आया और मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी। उनके  मार्गदर्शन में निरंतर उन्नत ज्योतिष पाठ्यक्रमों का अध्ययन कर रहा हूँ। हालांकि उनके अलावा भी, मुझे अपनी ज्योतिष सिखने की यात्रा में अनेक गुरुओं का मार्गदर्शन मिला जिनमे श्री अभिजीत कृष्णन जी, श्री संजय रथ जी मुख्य है। अभी वर्तमान में, मैं एक आध्यात्मिक और ज्योतिष गुरु श्री दत्तात्रेय तापकीर जी के निर्देशन में ज्योतिष में PHD कर रहा हूँ।

बस इतना कह सकता हूँ कि जो भी ज्ञान मेरे पास है, वह मेरे सभी गुरुओं का आशीर्वाद है। मेरे गुरुओं ने मुझे ज्योतिष के साथ-साथ कई गुप्त रहस्यों के बारे में भी जानकारी दी। इस साइट के ज़रिए गुप्त ज्ञान की इस गंगा को आगे बढ़ाना ही मेरा लक्ष्य है।

नैमिषारण्य में मिला एक गुप्त विष्णु महामंत्र! जानिए ‘जितं ते’ का अद्भुत रहस्य

नैमिषारण्य में मिला एक गुप्त विष्णु महामंत्र! जानिए ‘जितं ते’ का अद्भुत रहस्य

नैमिषारण्य में मिला एक गुप्त विष्णु महामंत्र! जानिए ‘जितं ते’ का अद्भुत रहस्य

अभी कुछ समय पहले नैमिषारण्य तीर्थ पर जाना हुआ। बहुत ही अद्भुत तीर्थ! बल्कि मैं तो ये कहूँगा कि जो मन से अध्यात्मिक है उसके लिए ये स्वर्ग के समान है। यहाँ की अनुभूति को शब्दो में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। सौभाग्य से मुझे यहाँ पर एक बहुत ही सुलझे हुए south के एक पंडित जी से मुलाक़ात हुई और उनसे जब वार्ता हुई तो उन्हे मेरे ज्योतिष विधार्थी होने के बारे में पता चला तो उनसे हुई वार्ता में, उन्होने ग्रहो के उपायो के संबंध में एक ऐसे गुप्त शक्तिशाली मंत्र के बारे में बताया जिसके बारे में, मैं भी अंजान था। उनके अनुसार ये गुप्त मंत्र बहुत ही असाधारण मंत्र है जोकि आज की समस्याओं के लिए रामबाण है। उन्होने बताया कि बहुत समय पहले south में एक बहुत बड़े विद्वान हुए है, जिनका नाम श्री पेरियावच्चान पिल्लई (Sri Periyavaccan Pillai) था, उन्होने ही इस मंत्र के बारे में संसार को बताया था।

 

तो आज मैंने सोचा कि क्यू न इस मंत्र को और इसकी महत्ता को आप लोगो को बताया जाय। वास्तव में यह मंत्र भगवान विष्णु के एक स्तोत्र का हिस्सा है लेकिन इन पंडित जी ने बताया कि अगर व्यक्ति इस स्तोत्र को पूरा न पढ़कर केवल इस मंत्र का ही सच्चे मन से जाप कर ले तो भी उसकी हर समस्या का निदान हो सकता है और ये शक्तिशाली मंत्र है—‘जितं ते’ महामंत्र

 

ये ‘जितं ते’ महामंत्र जिस स्तोत्र से लिया गया है उसका धरती पर उद्गम दो तरीको से माना गया है-

 

पहला– यह स्तोत्र वास्तव में ऋग्वेद का एक खिल भाग (Rigveda khilam) है, जिसका अर्थ है वेदों का एक ऐसा दुर्लभ हिस्सा जो बहुत कम प्रचलित रहा है।

महामंत्र का दर्जा: जिस प्रकार पुरुषसूक्त सभी श्रुतियों में मौजूद है, वैसे ही इतिहास और पुराणों में ‘जितं ते’ को एक महामंत्र और गुप्त विद्या ( confidential) माना गया है, जिसकी तुलना ‘तिरुमंत्रम’ से की जाती है।

धरती पर कैसे आया?: श्वेतद्वीप के निवासी इस स्तोत्र को गाकर क्षीराब्धि नाथ (भगवान विष्णु) की स्तुति करते थे। जब देवर्षि नारद श्वेतद्वीप जा रहे थे, तब उन्होंने एकांत, द्वित और त्रित नाम के ऋषियों से इसे सीखा। बाद में जयंत पर्वत पर ‘कुटुम्बी’ नाम के एक व्यक्ति ने नारद जी से आग्रह करके इसे प्राप्त किया और इसे इतिहास-पुराणों में लिखा, जिसके बाद यह आम मनुष्यों के लिए उपलब्ध हुआ।

 

दूसरा- ये जयाख्य संहिता से लिया गया है और जयाख्य संहिता सनातन धर्म के ‘पाञ्चरात्र आगम’ (भगवान विष्णु की उपासना पद्धति) के सबसे महत्वपूर्ण तीन ग्रंथों में से एक है।

  • उत्पत्ति: धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस ग्रंथ को किसी इंसान ने नहीं लिखा। सृष्टि के आरंभ में स्वयं भगवान नारायण ने यह दिव्य ज्ञान ब्रह्मा जी को दिया था, जो बाद में ‘जया’ नाम के ऋषि के माध्यम से हम तक पहुँचा। ऐतिहासिक रूप से यह ग्रंथ लगभग 1500 वर्ष पुराना (गुप्त काल का) माना जाता है।
  • इसमें क्या है?: यह ग्रंथ मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि मनुष्य बिना किसी बाहरी आडंबर के, केवल अपने मन और विचारों को शुद्ध करके भगवान से कैसे जुड़ सकता है।

 

महामंत्र और उसका सरल अर्थ

 

ये गुप्त और असाधारण पूरा मंत्र इस प्रकार है:

 

“जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन। नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज॥”

 

इसका बहुत सीधा और सुंदर अर्थ है: “हे कमल जैसे कृपामयी नेत्रों वाले (पुण्डरीकाक्ष), पूरे ब्रह्मांड को पालने वाले (विश्वभावन) और मेरी सभी इंद्रियों व मन के स्वामी (हृषीकेश) प्रभु! आपकी विजय हो, मैं आपके सामने अपने अहंकार को समर्पित करता हूँ।”

 

इस मंत्र का त्रिविध महत्व (आध्यात्मिक, ज्योतिषीय और व्यावहारिक)

 

  1. आध्यात्मिक महत्व: ‘सरेंडर’ की शक्ति

इसका अर्थ है कि जब इंसान कहता है “जितं ते” (प्रभु, आपकी जीत हुई और मैं हार गया), तो उसका अहंकार तुरंत समाप्त हो जाता है। यह मंत्र ‘पूर्ण शरणागति’ (Absolute Surrender) का प्रतीक है। जैसे ही आप अपनी समस्याओं का बोझ भगवान को सौंप देते हैं, आपके अंतःकरण में असीम शांति का संचार होने लगता है।

  1. ज्योतिषीय महत्व: ग्रहों के दुष्प्रभाव से मुक्ति

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हमारे जीवन के दुख मुख्य रूप से कमजोर चंद्रमा (चंचल मन), राहु-केतु (अज्ञात भय/तनाव) और शनि (कामों में रुकावट) के कारण होते हैं।

  • चंद्रमा और राहु की शांति: इस मंत्र में भगवान को ‘हृषीकेश’ (मन के स्वामी) कहा गया है। जब हम इसका मानसिक जाप करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं। इससे कुंडली का चंद्रमा मजबूत होता है, जिससे डिप्रेशन, घबराहट (Anxiety) और राहु-केतु की वजह से होने वाला अज्ञात भय जड़ से खत्म हो जाता है।
  • भाग्य का उदय: यह सात्विक भगवान विष्णु का मंत्र है, जिसके प्रभाव से कुंडली का सबसे शुभ ग्रह ‘बृहस्पति’ (गुरु) बलवान होता है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति को सही निर्णय लेने की बुद्धि और भाग्य का साथ मिलता है।
  1. व्यावहारिक महत्व: आज के जीवन में इसका उपयोग

एक आम इंसान, जो पूजा-पाठ के कड़े नियम नहीं जानता, वह भी इस मंत्र का पूरा लाभ उठा सकता है:

  • मानसिक थकावट दूर करने में: यदि ऑफिस या बिजनेस के तनाव से सिर फटा जा रहा हो, तो शांत बैठकर आंखें बंद करें और 5 मिनट इसका मानसिक जाप करें। यह ‘माइंडफुलनेस मेडिटेशन’ की तरह काम करता है।
  • अनिद्रा (Insomnia) का इलाज: यदि रात को चिंता के कारण नींद न आ रही हो, तो बिस्तर पर लेटे-लेटे मन ही मन “जितं ते… जितं ते…” दोहराएं। चंचल मन शांत हो जाएगा और बहुत गहरी व सुकून भरी नींद आएगी।

 

एक आम आदमी इसका उपयोग कैसे करे? (सरल विधि)

इस मंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसे ‘सार्वभौमिक’ (Universal) कहा गया है। इसके लिए किसी कठिन दीक्षा, विशेष आसन या हवन की जरूरत नहीं है।

  1. सुबह की शुरुआत: सुबह उठकर हाथ-मुंह धोने के बाद या स्नान के बाद, भगवान के सामने हाथ जोड़कर केवल 11 या 21 बार इस श्लोक को श्रद्धा से पढ़ लें। आपका पूरा दिन सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहेगा।
  2. संकट के समय: जब भी जीवन में कोई ऐसी परिस्थिति आए जहाँ आपको लगे कि सब रास्ते बंद हो गए हैं, तो आंखें बंद करके पूरी तरह भगवान पर भरोसा जताते हुए इस मंत्र का पाठ करें।

 

निष्कर्ष: यकीन मानिए कि जिस पंडितजी ने मुझे ये सब बताया है वो अत्यंत प्रभावशाली आध्यत्मिक ऊर्जा के स्वामी थे। अतः जो उन्होने बताया, मुझे उस पर पूर्ण विश्वास है। उन्होने बताया कि यह मंत्र हमें सिखाता है कि जब हम अपनी ताकत से थक जाएं, तो ईश्वर की अनंत शक्ति को अपना सारथी बना लेना चाहिए। इसीलिए आज से ही इस छोटे से दिव्य मंत्र को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं! और इसका feedback जरूर comments के माध्यम से share करे।

 

ॐ नमो नारायण!

4 comments on “नैमिषारण्य में मिला एक गुप्त विष्णु महामंत्र! जानिए ‘जितं ते’ का अद्भुत रहस्य

  1. आपने सचमुच बहुत ही अद्भुत और रहस्यमयी जानकारी साझा की है। आपके ब्लॉग से पाठकों को जो जानकारी मिलती है, वह शायद ही उन्हें कहीं और मिल पाए। आपका ब्लॉग पढ़कर मुझमें नई ऊर्जा का संचार हुआ है। आपके प्रति मेरा सादर सम्मान। ॐ नमो नारायण। जितं ते।

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