आज मैं आपको एक ऐसे विषय के बारे में बताने जा रहा हूँ जो आज के समय का सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण विषय है और वो है “ज्योतिष”।
इस विषय में जितना भी कहा जाय और जितना भी समझा जाय, कम ही है। क्योकि यह विषय अथाह सागर है और जितनी बार भी आदमी इसमें डुबकी लगाता है उतना ही इसमें से कुछ ना कुछ नया निकलता है। “ज्योतिष” को वेदों का नेत्र कहा गया है। अतः इस विषय को वेदाङ्ग की संज्ञा दी गई है।
हालांकि ज्योतिष में भी अनेक विषय है परन्तु आज मैं केवल उसमे से एक ऐसे टॉपिक पर बात करूँगा जो बहुत ही सरल तरीके से समझा जा सकता है और उसका अपनी दैनिक दिनचर्या में फायदा उठाया जा सकता है।
मानव शरीर जो भगवान की एक अद्भुत रचना है, वह बहुत रहस्यमय है और हमारे ऋषि मुनियों ने ज्योतिष में विभिन्न उपचारात्मक उपाय लिखे थे – उनमें से एक रत्न है, हमने विभिन्न लोगों को अपने हाथ में या लॉकेट में विभिन्न रत्न पहने हुए देखा होगा। लेकिन अगर वैज्ञानिक सोच के आधार पर देखा जाय तो ये सवाल उठता है कि क्या एक पत्थर का एक टुकड़ा आपकी मदद कैसे कर सकता है। लेकिन इस तथ्य को समझने के लिए हमें अपने उपनिषदों के मूलभूत वाक्य को समझना होगा वो है “यत पिंडे तत ब्रह्माण्डे” अर्थात “जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है” या “जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है”. यह एक संस्कृत श्लोक है जिसका अर्थ है कि मानव शरीर और ब्रह्मांड एक ही सिद्धांत और तत्वों से बने हैं, और एक दूसरे के समान हैं। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जो कुछ भी ब्रह्मांड में मौजूद है, वह सब कुछ मानव शरीर में भी मौजूद है।
रत्नों की उत्पति का पौराणिक संदर्भ-
ज्योतिष ग्रन्थों तथा कुछ अन्य प्राचीन विवरणों में रत्नों के जन्म के विविध पौराणिक प्रसंग भी मिलते है। इससे विभिन्न रत्नों की उत्पत्ति के संबंध में कैसी कैसी धारणायें प्रचलित रही है। इसकी जानकारी होती है। ज्योतिष के प्रमुख और सर्वमान्य ग्रंथ बृहत्संहिता में आचार्य वराहमिहिर ने पौराणिक विवरण को आधार बनाकर रत्नों के संबंध में प्रकाश डाला है।
प्रसिद्ध दैत्यराज बलि, जिसकी गलत मंशा को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन रुप धारण किया था, की अस्थियों से कुछ रत्नों की तथा वृत्रासुर के आतंक से देव वर्ग को मुक्त करने के लिए अपनी अस्थियां दान करने वाले महर्षि दधीचि की अस्थियों से भी अनेक रत्नों की उत्पत्ति हुई है। पौराणिक मतानुसार, उपर्युक्त 21 रत्नों की उत्पत्ति का मूल आधार राजा बलि का शरीर है।
उन्हीं के अंग प्रत्यंग से, जब वे आहत होकर धराशायी हुए, इन रत्नों का जन्म हुआ। आचार्य वराहमिहिर ने इस प्रसंग की व्याख्या अपने ग्रंथ बृहत्संहिता में की है। उक्त ग्रंथ के रत्नाध्याय में, उन्होंने विभिन्न रत्नों की उत्पत्ति बतायी है।
इसी क्रम में मैं आज उनमे से एक रत्न “लाजवर्त” यानी “lapislazuli ” के बारे में बात करेंगे। यह रत्न का जन्म राजा बलि के केशों से हुआ है। ये तो हुआ इसका पौराणिक दृष्टिकोण। अब इसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देखते है।
लाजवर्त या लैपिस लैज़ुली एक गहरा नीला सजावटी और औद्योगिक पत्थर है। यह कोई एकल खनिज नहीं, बल्कि खनिजों के समूह का मिश्रित रूप है।
लाजवर्त मुख्यतः निम्नलिखित खनिजों से मिलकर बना होता है:
खनिज प्रतिशत विशेषता
Lazurite 25–40% गहरे नीले रंग का मुख्य कारण
Calcite (CaCO₃) 10–15% सफेद धारियाँ या धब्बे
Pyrite (FeS₂) 5–10% सुनहरे चमकीले धब्बे
Sodalite, Hauyne नगण्य नीले रंग की विविधता में सहायक
👉 लाजवर्त का रंग lazurite की सल्फर-युक्त संरचना से उत्पन्न होता है।
त्वचा रोग की चिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान–
इस लाजवर्त यानी “LapisLazuli” रत्न का सम्बन्ध मुख्यतः शनि देव से है। वैसे तो इस रत्न के अनेको फायदे है जो मैं अभी नीचे बताऊंगा लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा मुझे मेरे ज्योतिष गुरु श्री दीपांशु गिरी जी ने बताया कि इस रत्न का ब्रेसलेट पहनने से किसी भी तरह की त्वचा की एलर्जी से पूर्णत निजात मिल जाती है जोकि मेरे अनुभव में भी शत प्रतिशत सही पायी गई। इसका चमत्कार मैंने खुद देखा है और मेरे गुरु की कृपा से बहुत लोगो का कल्याण हुआ है। जो लोग विभिन्न प्रकार की स्किन समस्याओं से ग्रसित थे चाहे वो किसी भी तरह की समस्या हो उनको ये ब्रेसलेट पहनने से अभूतपूर्व लाभ मिले है। वैसे तो आपने सुना होगा कि हर रत्न हर व्यक्ति के लिए नहीं होता लेकिन मैं अपने गुरु की कृपा से यह कहना चाहूंगा कि स्किन की कोई भी समस्या के लिए इस रत्न यानी लाजवर्त या LapisLazuli के ब्रेसलेट को किसी भी व्यक्ति द्वारा पहना जा सकता है। इसके लिए इसको बुधवार में या किसी भी षष्टी तिथि को धारण किया जा सकता है। इसको बाएं हाथ में पहनना चाहिए।
इसके अलावा इस ब्रेसलेट के बहुत सारे अन्य फायदे भी है जैसे-
- लाजवर्त थर्ड आई चक्र (Third Eye Chakra) और गले के चक्र (Throat Chakra) को सक्रिय करता है।
- यह अंतर्ज्ञान और संप्रेषण क्षमता को बढ़ाता है।
- यह मानसिक तनाव, चिंता और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा करता है।
- यह स्पष्ट संप्रेषण और आत्म-विश्वास में वृद्धि करता है।
- यह शिक्षा, लेखन, कला और ज्योतिष में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
- यह बुरी नजर से बचाने के लिए ताबीज के रूप में काम करता है।
- इससे अध्ययन, करियर, व्यवसाय, जीवन या आप जो भी प्रयास करते हैं, उसमें सफलता मिलती है।
- यह जबरदस्त रूप से सकारात्मक ऊर्जाओं का संग्रहक है।
- जिनको शनि ग्रह से सम्बंधित परेशानी हो उसको ये फायदा पहुंचाता है।
- जिनको थाइरॉइड या गले से सम्बंधित समस्या हो उसके लिए भी फायदेमंद है।
- जो लोग मानसिक स्पष्टता प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें इसे पहनना चाहिए।
- जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें इसे पहनना चाहिए।
- जो लोग अपने प्रयासों में सफलता चाहते हैं उन्हें इसे पहनना चाहिए।
- जो लोग समाज में अपनी स्थिति सुधारना चाहते हैं उन्हें इसे पहनना चाहिए।
- जो लोग पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता चाहते हैं उन्हें इसे पहनना चाहिए।
ब्रेसलेट कैसे पहनें:
यहाँ LapisLazuli ब्रेसलेट का उपयोग करने के कुछ तरीके दिए गए हैं। आप इस ब्रेसलेट का लाभ उठाने के लिए इनमें से किसी एक का उपयोग कर सकते हैं।
- इस ब्रेसलेट को किसी भी हाथ में पहन सकते है लेकिन अगर इसको बाए हाथ में धारण करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
- इस ब्रेसलेट को अपनी जेब या पर्स में रख सकते है।
- बच्चे इस ब्रेसलेट को अपने स्कूल/कॉलेज बैग में रख सकते हैं।
किस दिन पहनें:
वैसे तो इस ब्रेसलेट को किसी भी दिन और किसी भी समय पहना जा सकता है। लेकिन अगर इसको बुधवार, शनिवार या षष्टी तिथि के दिन सुबह में पहना जाय तो ज्यादा अच्छा है।
सबसे जरुरी बात:
किसी भी उपाय के लिए श्रद्धा और विश्वास अत्यंत आवश्यक है।
सावधानियां:
ब्रेसलेट पहनते समय ऐसी कोई रोकथाम नहीं है। इस ब्रेसलेट को पहनने के बाद आपको अपनी दिनचर्या में कोई बदलाव करने की ज़रूरत नहीं है। जब तक आप इससे शारीरिक और मानसिक रूप से जुड़े रहेंगे, यह काम करता रहेगा और आपको लाभ पहुँचाता रहेगा।









