आज के ब्लॉग मे, मैं एक ऐसे ज्योतिषीय टॉपिक पर बात करना चाहता हूँ जिसका आजकल विवाह संबंधो में अत्यधिक प्रचलन है। वो है मांगलिक दोष ।
मांगलिक दोष की व्याख्या तो आपको लगभग हर वैबसाइट या अन्य साधनों पर मिल जाएगी लेकिन क्या आपने सोचा है कि पिछले 30-40 वर्षो में ऐसा क्या हो गया जो आज कि तारीख में हर दूसरे -तीसरे व्यक्ति की कुंडली में मांगलिक दोष आ रहा है और इस कारण वो बहुत भयभीत है कि पता नहीं उसकी कुंडली में कितना बड़ा दोष है। क्या मंगल ग्रह बदल गया है या हमारी उसे देखने की दृष्टि?
इसको समझने से पहले हमे इसकी थोड़ी सी व्याख्या पर भी चलना होगा कि मांगलिक दोष बनता कैसे है? कुंडली में मांगलिक दोष तब बनता है, जब मंगल देव की स्थिति कुंडली के प्रथम यानि लगन, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में हो। हालाकि दक्षिण भारत में दूसरे भाव को भी इसमे शामिल करके देखते है।
अनेक ग्रंथों के आधार पर प्रचलित एक प्राचीन श्लोक इसकी पुष्टि करता है:
“लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे। स्त्रीणां भर्तृविनाशाय भर्त्ऋणां स्त्रीविनाशकम्॥”
- अर्थ: यदि लग्न, द्वादश, चतुर्थ, सप्तम या अष्टम भाव में मंगल हो, तो यह स्त्रियों के लिए पति और पुरुषों के लिए पत्नी के सुख में बाधक होता है।
मैं यहाँ पर यह मानकर चल रहा हूँ कि आप सबको कुंडली की बेसिक जानकारी है लेकिन फिर भी संक्षिप्त रूप में मैं आपको बताता चल रहा हूँ कि लग्न यानि प्रथम भाव व्यक्ति का स्वयं का शरीर है और यहाँ पर व्यक्ति के स्वभाव और स्वास्थ्य के बारे में जानकारी मिलती है । चतुर्थ भाव सुख और मानसिक शांति का घर है । सप्तम भाव विवाह और पार्टनर्शिप से संबन्धित है। अष्टम भाव व्यक्ति की आयु को बताता है और द्वादश भाव शैय्या सुख को इंगित करता है।
यहाँ इन भावो में मंगल देव का दोष क्यों है इसको समझने के लिए पहले हमे मंगल देव के मूल स्वभाव को समझना होगा।
शास्त्रो में मंगल देव को “अंगारक” कहा गया है, जिसका अर्थ है दहकता हुआ अंगारा । इसका अर्थ ये हुआ कि मंगल देव के उपरोक्त भावो में बैठने से वो अपने स्वभावानुसार इन भावो के परिणामो को भी प्रभावित करेंगे। इसको अगर एक गहरे रूप में समझे तो मांगलिक होने का मतलब है कि आपके भीतर “Ego Drive” और “Survival Instinct” सामान्य से बहुत अधिक है।
एक मांगलिक व्यक्ति को “समझौता” करना बस के बात नहीं है और विवाह की स्थिति ‘समर्पण” चाहती है और मंगल “आधिपत्य”। इसीलिए इन भावो में मंगल देव की मौजूदिगी विवाह के लिए अनुकूल नहीं है। मंगल देव को भूमिपुत्र भी कहा जाता है और भूमि का स्वभाव है “Territorial” होना इसका अर्थ यह है कि मांगलिक व्यक्ति अपने जीवन साथी पर, अपने स्पेस पर और अपने निर्णयो पर पूर्ण अधिकार चाहता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने यह व्यवस्था की कि ऐसे केस में वर और वधू दोनों को ही मांगलिक होना चाहिए तभी इनका विवाह चल सकेगा।
लेकिन अब समस्या यह है कि आज से 30-40 वर्ष पहले तो कोई भी मांगलिक दोष की इतनी बातें नहीं करता था और आज हर व्यक्ति इसकी ही बात करता है। इसका मुख्य कारण है कि पहले के ज्योतिषी केवल लग्न को ही आधार मानकर इस दोष की गणना करते थे परंतु आज यह केवल लगन से ही नहीं बल्कि चन्द्र और शुक्र से भी देखा जा रहा है। हालाकि ये विधि शास्त्रसम्मत है इसमे कोई दुविधा नहीं है और इसीलिए जब तीनों से मंगल दोष की गणना होने लगी तो इस दोष की Prabability बहुत ज्यादा हो गई और ये हर दूसरे- तीसरे व्यक्ति की कुंडली में दिखने लगा। अब सवाल यह है कि जब शास्त्रो में पहले से इसको तीनों विधियो से देखने की व्यवस्था थी तो पहले के ज्योतिषी लगन के अलावा बाकी दोनों से क्यों नहीं देखते थे?
इसको समझने के लिए हमे ज्योतिष के एक महत्वपूर्ण सूत्र को समझना होगा जिसमे यह कहा गया है कि देश, काल और पात्र के अनुसार कुंडली का विश्लेषण करना चाहिए यानि जिस समय जैसी परिस्थिति हो उसके अनुसार ही फलादेश करना चाहिए। अब आज का युग बहुत ही सवदेनशील हो गया है और स्वतंत्र भी। पहले ऐसा नहीं था क्योंकि तब समाज पितृसत्तात्मक था, महिलाएं समझौता कर लेती थीं। मंगल की उग्रता को “पारिवारिक अनुशासन” के नाम पर दबा दिया जाता था। इसलिए दोष होने के बावजूद शादियां टूटती नहीं थी, तो दोष पर चर्चा भी कम होती थी।
हमारे शास्त्रो में मंगल देव की ऊर्जा को सकारात्मक बनाने के लिए कई उपाय मौजूद है जैसे अपने शरीर से physical स्तर पर काम लेना, विभिन्न व्यायाम करना, खेल कूद में भाग लेना और सात्विक आहार लेना मुख्य है। लेकिन आजकल इसका उल्टा हो रहा है, आज शरीर से कोई काम नहीं लिया जा रहा है और अगर जिम में जाकर पसीना बहाया भी जा रहा है तो उसका आहार तामसिक है जोकि मंगल की ऊर्जा को बढ़ाता है। आज हर व्यक्ति फास्ट-फूड की तरफ अग्रसर है, मांसाहार की और ज्यादा रुझान है तो ऐसे में मंगल देव की तामसिक ऊर्जा को बढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा हम अपने बच्चो को शुरू से ही प्रतिस्पर्धा करना सिखा रहे है, जिससे हम उनके अंदर मंगल देव की ऊर्जा को बढ़ाने का काम कर रहे है।
तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति के शारीरिक स्तर (लगन) के साथ-साथ मानसिक स्तर (चंद्र) पर भी मंगल की स्थिति को देखना आवश्यक हो गया है और यही स्थिति विवाह के मुख्य कारक (शुक्र) से भी देखना आवश्यक हो गया है क्योंकि आज लड़का और लड़की स्वतंत्र है, शिक्षित है और सबसे बड़ी बात अपने नैतिक मूल्यो को दरकिनार कर रहे है।
पहले ये सब नहीं था, इसीलिए ज्योतिषी केवल लगन से ही इसकी गणना करते थे और उनके उपाय भी ऐसे ही होते थे जिससे मंगल देव की ऊर्जा को सकारात्मक किया जा सके और उन उपायो का आधार आध्यात्मिक और दैनिक दिनचर्या में बदलाव होता था, नाकि आज की तरह “within minute” वाला। आज लोगो को blinkit की तरह हर चीज मिनटों में चाहिए ऐसे ही वो इसके उपाय ढूंढते है। कि किसी ने जादू की छड़ी घुमाई और मंगल दोष खत्म । इसीलिए आज के ज्योतिषी भी ऐसे हो गए है जो व्यक्ति को इसका डर दिखाकर जातक से महंगे उपाय करवा रहे है जिससे उनकी दुकाने भी खूब चल रही है। क्योंकि आज के ज्योतिषी सेवा से ज्यादा धन को प्राथमिकता दे रहे है और ऐसे ही व्यक्ति को भी तुरंत वाला समाधान चाहिए नाकि अपने अंदर के तमस को मिटाकर।
इसमे समझने वाली बात यह है कि उपाय ‘Blinkit’ की तरह नहीं, बल्कि ‘Behavioral’ होने चाहिए।
असली समाधान क्या है?
मंगल कोई “बुरा ग्रह” नहीं है, वह एक प्रचंड ऊर्जा है। इसे संभालने के लिए महंगे पत्थरों या अनुष्ठानों से ज्यादा जरूरी है:
- शारीरिक अनुशासन: योग, खेल-कूद या भारी व्यायाम से इस ऊर्जा को चैनेलाइज करें।
- सात्विक जीवन: आहार में बदलाव लाएं ताकि तमस शांत हो।
- स्वभाव में परिवर्तन: मंगल देव का स्वभाव ‘Territorial’ होता है। वैवाहिक जीवन में “मैं” को छोड़कर “हम” को अपनाना ही सबसे बड़ा मंगल उपाय है।
- आध्यत्मिक उपाय : हमारे शास्त्रों मे मंगल देव के दोष के परिहार के लिए भगवान कार्तिकेय और हनुमान जी की उपासना बताई गई है अतः हमे उनकी शरण में जाना चाहिए।
निष्कर्ष: आज दोष ग्रहों में ज्यादा नहीं है, बल्कि आज हम मंगल देव की उस प्रचंड ऊर्जा को ‘झेलने’ या ‘स्वयं को झुकाने’ के लिए तैयार नहीं हैं। कुंडली मिलान से कहीं ज्यादा जरूरी है—स्वभाव का मिलान और एक-दूसरे के प्रति समर्पण। अगर हम स्वयं के अंदर के ‘तमस’ को मिटा लें, तो मंगल अमंगल नहीं करेगा।










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तार्किक व्याख्यान