लेखक का परिचय
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विजयादशमी: विजय का पर्व या भाग्योदय का अवसर?

विजयादशमी: विजय का पर्व या भाग्योदय का अवसर?

विजयादशमी: विजय का पर्व या भाग्योदय का अवसर?

कल दशहरा है और दशहरा शब्द ‘दश-हारा’ से बना है। ‘दश’ का अर्थ है दस और ‘हारा’ का अर्थ है पराजित। दशहरे के पर्व का मुख्य ऐतिहासिक आधार भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण का वध है। त्रेतायुग में इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अधर्म, अहंकार और अत्याचार के प्रतीक रावण का संहार कर धरती को उसके आतंक से मुक्त किया था। यह घटना इस बात का शाश्वत संदेश देती है कि अंततः जीत सत्य, धर्म और मर्यादा की ही होती है।

आज मैं आपको www.dharmsindhu.com के इस विशेष दशहरा लेख में दो विशेष उपाय बताऊंगा जोकि आपकी जिंदगी की दशा परिवर्तित कर देंगे। अगर आप भी अपनी किसी समस्या से ग्रसित है तो आप मेरी दूसरी वैबसाइट www.jyotishworld.com पर अपना व्यक्तिगत प्रश्न पूछ सकते है।   

आज आपको कल यानि दशहरे के दिन का एक ज्योतिषीय रोचक पहलू बताता हूँ। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में रहता है जोकि काल पुरुष कुंडली का 10th हाउस है यानि authority का हाउस और कुंडली के केंद्र स्थान का सर्वोच्च स्थान। और ज्योतिष में चंद्रमा को आदि शक्ति की ऊर्जा से जोड़ा जाता है यानि इस दिन का पूरा control माँ जगत जननी के हाथो में होता है।

ये कहावत है कि सभी लड़ाइयाँ पहले मन में जीती जाती हैं और बाद में धरती पर। मन का प्रतीक – चंद्रमा सत्ता (10th हाउस) के स्थान पर आसीन होने जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि मन ने अब सभी लड़ाइयों पर विजय प्राप्त कर ली है।

यह ब्रह्मांड की एक असाधारण घटना है और इसके पीछे भी एक और कथा है जब त्रेतायुग में लंकापति रावण के साथ युद्ध के दौरान जब नौ दिन बीत जाने पर भी रावण का वध नहीं हो पा रहा था और भगवान श्रीराम की चिंता बढ़ गई थी, तब उन्होंने विजय प्राप्ति और अधर्म के नाश के लिए आश्विन शुक्ल दशमी के दिन देवी अपराजिता की विशेष आराधना की थी और उन्हे 1001 नील कमल अर्पित किए थे, जिसमे माँ भगवती ने उनकी परीक्षा लेने के लिए, एक कमल छुपा दिया तो भगवान श्री राम ने अपने बाण से अपने एक नेत्र को जैसे ही अर्पण करना चाहा तो भगवान श्रीराम की इस आराधना और समर्पण से प्रसन्न होकर देवी अपराजिता ने उन्हें अजेय होने और विजय का आशीर्वाद दिया था, जिसके उपरांत श्रीराम ने रावण का संहार किया था।

अतः ये कहना चाहिए कि भगवान राम को भी पता था कि बिना भगवती की कृपा के ये युद्ध नहीं जीता जा सकता।  

कल के दिन का पहला विशेष उपाय-
विजय दशमी के अवसर पर आपको अपने आयुध (हथियारों) की पूजा करनी चाहिए। यहाँ हथियार से मतलब उस चीज से है जिससे आप अपने कार्य क्षेत्र में अपने कार्यो को निर्वहन करते है जैसे यदि आप आईटी या लैपटॉप से ​​संबंधित काम करते हैं, तो लैपटॉप ही आपका हथियार है। इसके चारों ओर गंगाजल छिड़कें और इस मंत्र का जाप करे –

“Om Vijayaadevyai Vidmahe Mahaanityaayai Dheemahi Tanno Devi Prachodayat”
ॐ विजयादेव्यै विद्महे ।महानित्यायै धीमहि ।तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

अपनी मेज पर लाल कुमकुम लगाएं, जहां आप बैठते हैं वहां इत्र छिड़कें, और यदि संभव हो तो जीवन की किसी भी बाधा को दूर करने के लिए हवन में इस मंत्र की 108 बार आहुति दे ।आप अपनी सुविधानुसार 11/21/31 बार भी आहुति दे सकते हैं। कल ब्रह्मांड से ऊर्जा प्राप्त करने का दिन है, इस ब्रह्मांडीय घटना को व्यर्थ न जाने दें।

आज भी देश के काफी हिस्सो में, दशहरे के दिन आपता के पत्तों को ‘सोना’ मानकर एक-दूसरे को बाँटने की परंपरा है, इस परंपरा का सीधा संबंध त्रेतायुग की एक महान कथा से है।

  • भगवान श्रीराम के पूर्वज महाराज रघु ने ‘विश्वजित यज्ञ’ करके अपना सारा राजपाट दान कर दिया था। जब महर्षि कौत्स ने उनसे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा के रूप में माँगीं, तब राजा रघु ने धन के देवता कुबेर पर आक्रमण करने की ठानी।
  • राजा के तेज और धर्म से भयभीत होकर कुबेर ने आपता (Mountain Ebony) और शमी के वृक्षों पर सोने की वर्षा कर दी। राजा ने केवल उतनी ही मुद्राएँ लीं जितनी आवश्यकता थी और बाकी प्रजा में बाँट दीं। यह दिन दशहरे का ही था।
  • इसी ऐतिहासिक प्रसंग की याद में आज भी दशहरे पर ‘सोना’ (आपता के पत्ते) बाँटा जाता है, जो भौतिक धन से अधिक प्रेम, संतोष, त्याग और विजय के स्वर्ण रूपी भाव को आपस में साझा करने का प्रतीक है।

कल का दूसरा विशेष और अति महत्वपूर्ण ज्योतिषीय उपाय:

कल मंगलवार और विजयादशमी का एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसमें खगोलीय ऊर्जा का अद्भुत सामंजस्य है:

  • ज्योतिषीय तर्क (Logic):
    1. उच्च के गुरु (Jupiter) और सोना: ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को शुद्ध स्वर्ण (Gold) और समृद्धि का मुख्य कारक माना गया है। वर्तमान में गुरु देव अपनी उच्च राशि (कर्क) में गोचर कर रहे हैं, जोकि शुभ अवस्था मे है।
    2. नीच का मंगल और हनुमान जी: कल मंगलवार है और मंगल देव अभी नीच राशि (कर्क) में ही गोचर कर रहे हैं, जिससे पराक्रम में रुकावट आ सकती है। हनुमान जी की आराधना नीच के मंगलदेव के दुष्प्रभावों को शांत करती है, जबकि उच्च के गुरु देव उस ऊर्जा को सकारात्मक समृद्धि में बदलते हैं।
    3. श्रीराम और हनुमान जी की संयुक्त ऊर्जा: विजयादशमी के दिन श्रीराम और हनुमान जी की शक्तियाँ मिलकर व्यक्ति के भीतर ‘क्षत्रभाव’ (वीरता) को जागृत करती हैं।
    4. बूंदी के लड्डू और सोने का वर्क: बूंदी के लड्डू हनुमान जी को प्रिय हैं, और उन पर ‘सोने का वर्क’ (Gold Vark) लगाना सीधे तौर पर उच्च के गुरु देव की ऊर्जा और दशहरे पर ‘सोना बाँटने’ की परंपरा को एक साथ साध लेता है।
  • उपाय की विधि:
    1. कल ताजे बूंदी के लड्डू लाएँ और उन पर साफ-सुथरा सोने का वर्क अच्छी तरह लगवा लें।
    2. इसे हनुमान जी के मंदिर या अपने घर के मंदिर में भोग के रूप में अर्पित करें।
    3. भोग लगाते समय जीवन की हर बाधा और शत्रु-बाधा को दूर करने के लिए इस मंत्र का जाप करें:

             “ॐ रामदूताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान प्रचोदयात् ॥”

  1. पूजा के बाद इस ‘सोने के वर्क’ लगे बूंदी के लड्डू के प्रसाद को परिवार और इष्ट-मित्रों में ‘सोने के प्रतीक’ के रूप में आपस में बाँटें।

यह उपाय आपके जीवन से नकारात्मकता को समाप्त कर भगवान श्री राम और श्री हनुमानजी का आशीर्वाद और अपार समृद्धि लेकर आएगा।

आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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