परसो यानि 4 september को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व है, तो मैंने सोचा कि श्री कृष्ण और इस अष्टमी तिथि के कुछ गूढ रहस्यो को आपके सामने लाया जाय। आज का ये लेख पूरी तरह से मेरे गुरु श्री दीपांशु जी की शिक्षाओ पर आधारित है। इसमे आपको प्रचलित इंटरनेट ज्ञान नहीं मिलेगा बल्कि कुछ अलग रहस्य जानने और समझने को मिलेंगे।
हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हम सभी बड़े उल्लास से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। मंदिरों में झांकियां सजती हैं, घरों में व्रत रखे जाते हैं और मध्यरात्रि 12 बजे शंख-घड़ियाल के साथ कान्हा का स्वागत होता है।
लेकिन क्या कभी आपने विचार किया कि भगवान का जन्म आधी रात को ही क्यों हुआ? वे अष्टमी तिथि को ही क्यों जन्मे, जिसे सामान्य ज्योतिष में बहुत कठिन माना जाता है? और उनके जीवन के संकेत—जैसे उनका हमेशा मुस्कुराना, त्रिभंग मुद्रा में एक पैर पर तिरछा खड़े होना, या सबको साथ लेकर चलना—हमारे मन, भाग्य और भोजन से कैसे जुड़े हैं?
वास्तव में, श्रीकृष्ण का प्राकट्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है; यह वैदिक मनोविज्ञान, पंचांग विज्ञान, खान-पान और जीवन संतुलन का एक अद्भुत सूत्र है। आइए इसे अत्यंत व्यावहारिक भाषा में समझते हैं ताकि इस जन्माष्टमी पर आप न केवल पूजा करें, बल्कि अपने जीवन के मानसिक तनाव और ग्रहों के गहरे असंतुलन को भी ठीक कर सकें।
श्रीकृष्ण का जन्म: ब्रह्मांडीय संतुलन का समय
प्राचीन गणनाओं और वैदिक पंचांग के अनुसार, लगभग 5,000 वर्ष पूर्व जब भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ, तब उस समय एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बना था जिसे ‘जयंती योग’ कहा जाता है:
- लग्न: वृषभ लग्न (Taurus)
- चंद्रमा: उच्च का चंद्रमा ठीक लग्न में स्थित था।
- नक्षत्र व तिथि: रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि।
नोट- संयोग से इस बार कई वर्षो के पश्चात यह योग 4 september की रात में लगभग 10 बजे से 11 बजे तक रहेगा, जिसमे ये तीनों चीजे एक साथ होगी।
इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है?
ज्योतिष में चंद्रमा हमारे ‘मन’ और ‘भावनाओं’ का स्वामी है। लग्न में उच्च का चंद्रमा होने का अर्थ है—एक ऐसा मन जिस पर संसार के किसी भी तूफान या विकट परिस्थिति का कोई असर नहीं हो सकता।
श्रीकृष्ण चंद्रवंशी थे। लग्न में चंद्रमा के कारण उनका स्वभाव ऐसा था कि वे किसी को भी असंतुष्ट नहीं छोड़ते थे; उनके पास हर किसी के लिए कुछ न कुछ था। यहाँ तक कि वे अपने शत्रुओं को भी सही और हितकारी सलाह देते थे। पूरे महाभारत में उन्होंने किसी के प्रति बदले की भावना नहीं रखी। वे निष्पक्ष रहे—पांडवों के सारथी बने, कौरवों को अपनी नारायणी सेना दी और पूरी तरह अनासक्त रहकर केवल कर्तव्य पर ध्यान दिया।
अष्टमी तिथि का गूढ़ रहस्य: ऊर्जा का संतुलन और दोष निवारण
वैदिक ज्योतिष में साधारण तौर पर अष्टमी तिथि को कठिन तिथि माना जाता है, लेकिन इसके पीछे का ऊर्जा विज्ञान अत्यंत गहरा है:
अष्टमी को जन्मे लोगों का मनोविज्ञान
पुरानी कड़वाहट पकड़कर बैठना: अष्टमी तिथि को जन्मे व्यक्तियों में अक्सर यह स्वभाव देखा जाता है कि वे पुरानी बातों, मनमुटाव और शिकायतों को दिल से लगाकर बैठ जाते हैं। वे बीती बातों को छोड़ नहीं पाते, जिसके कारण वे दूसरों से ज्यादा खुद को भीतर ही भीतर परेशान करते हैं।
निर्णय लेने में स्पष्टता की कमी: अष्टमी का अर्थ है दो पक्षों के ठीक बीच का संधिकाल। ऐसे लोग जीवन में न तो किसी बात के लिए दृढ़ता से ‘हाँ’ कह पाते हैं और न ही स्पष्ट ‘ना’। इस असमंजस और दोहरे रवैये के कारण समाज में उन्हें अक्सर गलत समझ लिया जाता है, जो आगे चलकर अपमान और नुकसान का कारण बनता है।
- समाधान: ऐसे लोगों को कूटनीति, स्पष्ट निर्णय और निष्पक्षता सीखने के लिए श्रीमदभगवद्गीता का नियमित अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
श्रीकृष्ण की ‘तिरछी मुद्रा’ का रहस्य
संसार में यदि आप बिल्कुल सीधे और अड़ियल बनकर चलेंगे, तो हर मोड़ पर परिस्थितियों से टकराकर टूट जाएंगे। इसीलिए श्रीकृष्ण कभी सीधे खड़े नहीं होते—वे हमेशा एक पैर को मोड़कर, थोड़ा तिरछा खड़े होकर बाँसुरी बजाते हैं। यह ‘त्रिभंग मुद्रा’ संकेत है कि जीवन में संतुलन कभी सीधे चलकर नहीं, बल्कि लचीलेपन और दोनों पक्षों को समझकर व्यावहारिक होने से बनता है।
अष्टमी तिथि और सूर्य देव का गहरा ज्योतिषीय सिद्धांत
अष्टमी को जन्मे जातक की कुंडली में सूर्य देव जिस भी भाव में बैठते है, उस भाव के फलों में अक्सर असंतुलन आ जाता है।
- उदाहरण के लिए, यदि सूर्य देव दूसरे भाव या वृष में बैठे हो, तो धन और पारिवारिक सुख में भारी उतार-चढ़ाव या असंतुलन देखने को मिलता है। इसके उपाय के लिए जब भी गोचर में सूर्यदेव वृषभ राशि या दूसरे भाव में आए, तब उस समय अष्टमी तिथि के दिन अष्टमहालक्ष्मी का व्रत रखने से दूसरे भाव की ऊर्जा पूरी तरह संतुलित हो जाती है।
किसी भी भाव को ठीक करने का सार्वभौमिक उपाय
अष्टमी तिथि वास्तव में ‘ऊर्जा को संतुलित करने वाली तिथि’ है। भले ही आपका जन्म अष्टमी को न हुआ हो, आपकी कुंडली का जो भी भाव पीड़ित या असंतुलित हो, आप उसे अष्टमी पर ठीक कर सकते हैं:
- नियम यह है कि जब भी गोचर के सूर्यदेव आपकी कुंडली के उस असंतुलित भाव (जैसे संतान व बुद्धि के 5वें भाव, या कर्म के 10वें भाव) से भ्रमण कर रहे हो, तब उस महीने पड़ने वाली अष्टमी तिथि से उपवास रखना शुरू कर दें। इससे उस विशेष भाव की ऊर्जा शुद्ध और संतुलित होना शुरू हो जाती है। उदाहरण के लिए जैसे वर्तमान में सूर्य देव सिंह राशि में गोचर कर रहे है और यदि आप मेष लगन के व्यक्ति है तो सिंह राशि आपके 5वे भाव में आएगी और आपको अपने बच्चो या शिक्षा संबंधी कोई समस्या है तो आप इसी अष्टमी से व्रत रखना शुरू कर सकते है।
‘महारास’ क्या है?
बहुत से लोग महारास को केवल गोपियों के नृत्य के रूप में देखते हैं, लेकिन आध्यात्मिक रूप से महारास का अर्थ है—परम तृप्ति और आत्मिक आनंद।
यह आनंद हर इंसान के भीतर मौजूद है, लेकिन यह ईर्ष्या, शिकायतों, बदले की भावना और मानसिक कचरे के नीचे दब गया है। जैसे किसी मैली वस्तु को साफ करने पर उसकी असली चमक बाहर आती है, वैसे ही जब हम अपने मन की गंदगी धोते हैं, तो महारास की अनुभूति होती है।
महारास का अनुभव करने की 2 मिनट की सरल विधि:
- किसी शांत जगह पर बैठ जाएं। अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
- अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर 110 डिग्री के कोण पर फैलाएं (जैसे आप ब्रह्मांड से कुछ प्राप्त करने के लिए दोनों हाथ खोले खड़े हों)।
- आँखें बंद करें और कल्पना करें कि श्रीकृष्ण आपके सिर के शीर्ष (सहस्रार चक्र) पर दिव्य अमृत की वर्षा कर रहे हैं।
- आपके मन की सारी चिंताएं, पुरानी कड़वाहट और तनाव पानी की तरह धुल रहे हैं।
- 2 से 3 मिनट में ही आपको हृदय में एक गहरी शांति, पेट में हल्की गुदगुदाहट या सिर पर शीतलता का अहसास होगा। यही महारास की एक झलक है।
आने वाली जन्माष्टमी पर करने योग्य महा-उपाय
इस आने वाली जन्माष्टमी पर अपने घर, मन और कुंडली के असंतुलन को दूर करने के लिए ये उपाय अवश्य करें:
उपाय 1: सात रसों से श्रीकृष्ण का ‘महा-अभिषेक’
यह अनुष्ठान जीवन से लुप्त हो चुके आनंद और ऊर्जा को पुनः जगाता है।
- सामग्री: श्रीकृष्ण (या लड्डू गोपाल) की प्रतिमा (संभव हो तो चांदी या पीतल की)।
- अभिषेक का निर्धारित क्रम:
- शनि का रस: तिल का थोड़ा सा तेल (या मेवों का अर्क)।
- मंगल का रस: गन्ने का रस या गुड़ का मीठा पानी।
- बुध का रस: ताजे फलों का रस या आंवला/तुलसी का जल।
- शुक्र का रस: सुगंधित गुलाब जल।
- गुरु का रस: केसर मिश्रित जल या गाय का पिघला हुआ थोड़ा सा घी।
- चंद्रमा का रस: कच्चा गाय का दूध या ताजा दही।
- सूर्य का रस: अंत में शुद्ध गंगाजल या स्वच्छ जल से संपूर्ण स्नान कराएं।
- शृंगार व भोग: स्नान के बाद ठाकुर जी को सुंदर वस्त्र पहनाएं, मोरपंख और प्राकृतिक इत्र लगाएं। इसके बाद आपको अपने जीवन में जिस रस की कमी महसूस हो (जैसे शांति के लिए माखन-मिश्री, ऊर्जा के लिए गुड़ की मिठाई, विवेक के लिए बेसन के लड्डू), उसका भोग लगाएं और प्रसाद के रूप में सबको बांटें।
नोट- यहाँ रस से स्नान कराने का विशेष कारण है। हमारे शरीर में सात रस (द्रव्य) और नौ प्रकार की भावनाएं होती हैं। ज्योतिष के अनुसार, चंद्रमा भोजन का कारक है। आप किस प्रकार का भोजन करते हैं, उसी प्रकार का रस आपके शरीर में बनता है और वही रस आपके मन की सोच और भाग्य को तय करता है।
उपाय 2: अष्टमी पंचांग और वास्तु उपाय
- जन्माष्टमी के दिन घर के मुख्य द्वार पर चावल के आटे या प्राकृतिक रंगों से सुंदर रंगोली बनाएं।
- पूजा स्थल पर श्रीकृष्ण की प्रतिमा को एक तांबे के पात्र में स्थापित करके विधिवत पूजन करें। तांबा सूर्य का धातु है, जो अष्टमी तिथि पर घर की नकारात्मक ऊर्जा को सोखकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
उपाय 3: मानसिक शांति और चंद्रमा को बलवान करना
- यदि जन्मकुंडली में लग्न का चंद्रमा कमजोर या नकारात्मक फल दे रहा हो, या मन में पुरानी कड़वाहट घर कर गई हो, तो श्रीकृष्ण की शरण सबसे बड़ा सहारा है।
- जन्माष्टमी से आरंभ करके प्रतिदिन कम से कम 10 मिनट “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥” महामंत्र का शांत भाव से जप करें।
जन्माष्टमी केवल रात 12 बजे का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अपने खान-पान को शुद्ध करने, मन से पुरानी कड़वाहट को बाहर फेंकने और श्रीकृष्ण की तरह हर हाल में मुस्कुराते हुए जीने का संकल्प लेने का दिन है। इस पावन अवसर पर इन वैज्ञानिक व आध्यात्मिक उपायों को अपनाएं और अपने जीवन में सच्चे ‘महारास’ का आनंद महसूस करें।









